ह्यूमेन्स ऑफ़ गलगोटीआस और मैं!

हुमेंस ऑफ़ न्यू यॉर्क को तो सबने सुन रखा होगा, लेकिन में ब्रैंडन को नहीं जानता था। सचमुच नहीं जानता था। लेकिन किसी का लाल माइक ले कर, समाज के ऐसे तबको की कहानियों को टेलेविज़न स्क्रीन पे लाना और उसे बेहद ही सहज और अलग तरीके से बताना, मुझे प्रवावित कर गया था। मुझे शायद ये बात समझ आने लगी थी की हर सुपर हीरो इंस्टाग्राम के फ़िल्टर और टेलेविज़न के स्क्रीन से नहीं दिखता, हमारे और आपके आसपास अनगिनत, असंख्यक सुपरहीरो रहते हैं जो तमाम मुश्किलातों के बाद भी हर चीज़ से लड़ रहे होते हैं।


कभी सोचता था, की कुछ ऐसी कहानियां करूँ। लेकिन एक दिन हुमेन्स ऑफ़ गलगोटिया कुछ यूँ ही मेरे से टकरा गया। फिर मैंने खूब गूगल किया, और ब्रेंडन और उनके हुमांस ऑफ़ न्यू यॉर्क के बारे में पढ़ा और जाना। ब्रेंडन को जान कर  ऐसा लगा, की शायद कुछ चीजें की नहीं जाती है, वो बस अनायास हो जाती है।

फिर क्या था, हमने भी कहानियां बतानी शुरू कर दी। हम लोगो के पास गये, खूब गये। किसी ने भगा दिया, कुछ कैमरा और पब्लिश होने के खतरे से असहज से हो गये लेकिन बहुत सारे लोगों ने, दिल खोल कर अपनी जिंदगी के पन्नो को खोल दिया।

शायद नाम लेना सही नहीं होगा लेकिन बहुत सारे लोगों ने ऐसी भी बातें बताई जो हम आगे नहीं लिख सकते थे| सेंसर का ज़माने में, हमने बेहिचक सेंसर कर दिया। किसी ने बताया कि कैसे वो, पीएचडी की कोचिंग करने के लिए घर से दिल्ली भाग आए जब की उनके पिताजी ने बहन की शादी के कारण, जाने से साफ़ मना कर दिया। वो ट्यूशन पढ़ा कर, बचाये हुए पैसों को लेकर दिल्ली आ गए और दिल्ली आते ही वो बीमार हो गए और उनके सारे पैसे इलाज में चले गए और कैसे उन्होंने दिन में सिर्फ आठ रुपये के एक चाय और परांठे खा कर गुजारा किया और फिर IIT गये।

एक मैडम ने ये बताया कि कैसे लोग उनके तलाक शुदा होने के बारे में जानते ही, उनपे राय बना डालते है, बिना उन्हें जाने और समझे। कभी कभी लगता है कि समाज के बहुत सारे लोग, अपने ड्राइंग रूम के दीवार पर बहुत सारी डिग्रीयां टांग कर भी, अंदर से बहुत खोकले होते हैं। कोई अपनी कहानियां बताते बताते रोने लगे गया तो किसे फैकल्टी ने बताया कि कैसे उनके साथियों को फ्रेशर्स डे पर लड़कियों के कपड़ो पे आपत्तियां होने लगती है और वो ऐसे लोगों से बात भी नही करना चाहते।

हम किसी रोज उमर के पास भी गये जो कश्मीर से था, शुरू में वो कश्मीर के बारे में बोलने में बेहद असहज था। फिर कुछ बातें हुईं, जब वो सहज हो गया तो उसने बताया कि कैसे उसने अपने घर के आसपास आज तक एक भी गोली चलते हुए नहीं देखी है। सुन कर मुझे तो अचंभा नही हुआ, लेकिन ऐसे लोग जो टेलेविज़न देख कर कश्मीर को समझते हैं, उन्हें कभी कश्मीर जाना चाहिए। उमर का दिल्ली आना और पढ़ना, उन पत्थरबाजों और आतंकवादियों के मूहँ पर बहुत बड़ा तमाचा भी है जो इंसान और इंसानियत की जरा सी भी खिदमत नहीं करते।

कुछ कहानियां वीड की तरह बहुत हाई थी तो कुछ बियर की तरह बहुत फिजी। कांफ्रेंस कॉल पर हर सेमेस्टर के पहले बैच सेलेक्ट करना अपनी कहानी लगती है तो कुछ कहानियों के ऑथेंटिसिटी के चक्कर में बहुत बहस हुई।

अब बात उन लोगों की, जिनके बिना ये संभव नहीं था। वो कल भी थे, और आज भी है। लेकिन अब कहानियां कवर करने का मन नहीं करता है। हुमांस ऑफ़ गलगोटिया अब हॉग पिक हो गया है लेकिन अब हम कहानियां नहीं कर रहे हैं। कहानियां तो कल भी थी, आगे भी रहेगी और फिर एक दिन कहानियां तो हम सब भी बन जाएंगे।

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